मधु सिंह की नज़्में और ग़ज़लें

 


Madhu Singh's poetry is inspired by nature and experiences gained by traveling. She is experienced in the IT Sector and in her free time dabbles in free verse and oriental poetry.  She resides in New Delhi, India.

मधु सिंह की रचनाए उनके सफर और फ़ितरत से मुदासिर है। वे आई टी फील्ड में तजुर्बाकार हैं। अपने खाली वक़्त में वे ऍंग्रेज़ी और हिंदी में  नज़्में, ग़ज़लें और मशरिक़ी काव्य लिखती है। वे नई दिल्ली में रहती हैं।  


१. घेरों का फ़साना  


तुम हसीन दायरों में जीती हो

तुम्हारे महबूब की बेसब्र आगोश

तुम्हे पैवस्तगी से घेरे हुए हैं

तुम्हारे फरिश्ता नुमा औलाद की किलकारी 

तुम पर हर पल चश्मे सा बरसती है

तुम्हारी चहचहाती सहेलियों की 

हर्फ-ओ-हिकायत तुम परआश्ना है


तुम्हारी नौ-इंची हील के तले 

ज़माने का असास पा-बस्त है

तुम्हारी लिपस्टिक की सुर्खी

हर सुबह रोशनाई फैलाती है 

तुम्हारी ज़ुल्फ-ओ-सबा से उड़ कर 

अब्र-ए-बहार आस्मान पे छाए हैं 


तुम हसीन दायरों में जीती हो

हम तंग लकीरों में खींचे हैं

 

ये दायरे तुम्हे फ़र्ज़-सनाशी से थामे हुए हैं 

इन्हे इतना ही हसीन रहने दो

जीतने वो हैं 


२. क्रूजिंग द ब्राईनी डीप


यूँ तो समंदर 

धरती का लरज़ा लरज़ा सा लिबास है

और ज़र्द दोपरहों में इसकी सिलवटों पर

रोशनाई थिरकती रहती है


लहर दर लहर

यह साँप मुझे अपनी कुंडली में घेर लेता है

पर इसका नीलम हुस्न

इक धुँधलाहट से पोशीदा है

जिसे मेरे बीमार हर्फ़ 

मुअनकिस नहीं कर सकते 


३. ट्रिब्यूट टू गुलज़ार

  

सांझ ढलते

जब तारीक़ी में फ़ना होता है

दिन का बैन

हर बाम-ए-सितारा से

हर्फ़ उतरते हैं

पिरो लेते हैं खुद को

गौहर की जंज़ीर में

सजते हैं गले पर

घुलते हैं साँसों में मेरी

बनकर तेरी नज़्म


४. खिज़ा


पतझड़ में नग्न साल के पेड़ यूँ लगे 

जैसे किसी सर्द बेरोशन स्टडी में

काली कठोर अलमारियाँ 

बिन पुस्तकों के खाली पड़ी हो...


उन पेड़ों में पत्तों की सरसराहट नहीं थी

और उन ताकों से गुम हैं हर्फ़ों की सरगोशियाँ.


५. इक शहर जगा-जगा सा  


ये शहर आँखें नहीं मूँदता

इसकी अपलक सड़कों पर

जुगनू से नारंगी हेडलाइटें 

रात-भर टिम-टिमाते रहती हैं


इन राहों के मेलों में

चरखों से घूमते चक्के

कभी चींटियों से रेंगते 

कभी मधु-मक्खियों से भिनभिनाते हैं 


मेट्रो की पटरियों पर

ये रोशन डिब्बे

रागिनियों से बजते हैं

यहाँ ध्रुत लय में

तहाँ विलंबित ताल में


इस दयार-ए-हिज्र 

केआसमाँ के सिरे से

तारों की चादर उधड़ गई है

और एल.ई.डी की 

रंगीनियाँ छा गई हैं


दिलों के इस बियाबान में

अपने पास नहीं हैं, बस उनकी यादें हैं

इसके बन्दो की आँखों में

ख्वाब तो हैं, पर नींद नहीं


६. अमृत-मंथन


हमारे नैनों के पानी से सागर भरा गया

जिसमें हमारे सब्र का पहाड़ रखा गया

अपनी ही वासनाओं की रस्सियों से

स्वयं हमने अपना मन-मंथन शुरू किया


एक-एक करके

हमारी इच्छाओं के विष उभरा

एक से एक बढ़ कर विकृत

एक से एक बढ़ कर अश्लील

एक से एक बढ़ कर प्रबल


हमारे फरिश्तों ने उस काल-कूट

का एक-एक घूँट  पिया

और एक-एक कर ढेर होते गये


हमारी कमाग्नि फिर भी ना बुझी

अंतत: शिव को नीलकंठ बनना पड़ा

तब हमें कुछ देर के लिए शर्म आई

लेकिन फिर हमारी अभिलाषा का वृक्ष

आसमान चढ़ने लगा


७. ग़ज़ल: तिश्नगी

   

तिश्नगी हद से बढ़ गई उन्हें पाने की

अब फ़िक्र किसे रही इस ज़माने की

छोड़ आये पीछे कारवां-ए-लाला-ओ-गुल

सदा आ रही है अब बस मेयखाने की

दस्त-ए-साक़ी बाँटता है प्यालों में शराब

बारी आई फ़लक में माहताब के शर्माने की

क्या राज़ है 'मधु' जो तुम बिन पिए मस्त हो

होठों को तलब है अब किस पैमाने की  


८. ग़ज़ल: अब दिल-ए-नादान  


अब दिल-ए-नादान को समझाते हैं वो

सब्र की इन्तेहाँ फिर आज़माते हैं वो

यूँ तो मोहब्बत है उस परीवश को भी

शर्म-ए-रुस्वाई से घबराते हैं वो

हर पारा-ए-दिल में बंद अक्स उन्हीं का   

हर चश्म-ए-तर में बह आते है वो

गरचे है सहर-ए-फिराक़ की कड़ी धूप

उम्मीद-ए-वस्ल पे जिए जाते हैं वो

'मधु' है राह-ए-इश्क़ बस काँटों भरी

क्यों बेवज़ह केहकशाँ दिखाते हैं वो


९. ग़ज़ल: नौहा-ए-कोरोना


इस से बढ़ के भी क्या इन्तेहाँ होंगे

न साँसें मिलेंगी न शमशान होंगे

खोरे के जैसे दरिया में लाशें बहेंगी

न डॉक्टर बचेंगे न इंसान होंगे

कुम्भ और इलेक्शन के मेले सजेंगे

वो भाषण देंगे हम बेज़ुबान होंगे

हर सियाह रात का दिन होता है

ई वी एम् की उंगली से पूरे अरमान होंगे 


१० ग़ज़ल: फिर उस हर्फ-ए-जुनूँ 


फिर उस हर्फ-ए-जुनूँ की सरगोशियाँ हैं

सबा-ए-नौबहार की मदहोशियाँ हैं.

सदा तेरी ही है बस मेरे ज़हन में

वरना दश्त-ए-दिल में फक्त खामोशियाँ हैं

बस्ती है भरी हुई, शक्श भी बहुत हैं

भीड़ में कोई दोस्त नहीं बस तनहाईयाँ हैं

बड़े नाज़ से आए थे हम तेरी बज़्म में

लेकिन कू-ए-यार में बस रुसवाइयाँ हैं

कहाँ का रुख़ करें यार तू ही है हर सू

जिस सिंत चश्म उठे तेरी परछाईयाँ हैं

साकी तेरे दामन में मुझे क्या चैन है   

शराब के इन प्यालों में सिर्फ़ तल्खियाँ हैं

दुआ-ए-उम्र नहीं इसे दवा-ए-दिल ही दे

क़ैद-ए- इश्क़  से बड़ी क्या बीमारियाँ हैं

ज़िंदाँ-ए-हयात में निजात-ए-दर्द क्यूँ हो

जहाँ में तो बस गम की सरदारियाँ हैं

सक्त हो जाए वक़्त तो घबराना ना दोस्त

मुश्क़िलें जितनी बढ़ें आसानियाँ हैं

गम ना करना ‘मधु’ कोई ख्वाब जो टूटा

इस उजड़े दयार में बस बेख्वाबियाँ है

 

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